समास – समास की परिभाषा , समास के प्रकार | samas ki paribhasha

आज हम हिंदी व्याकरण के अंतर्गत आने वाला सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक समास पर चर्चा करने वाले हैं. (samas ki paribhasha ) इससे पहले हमने संधि के बारे में पढ़ा था. यदि आपने संधि के बारे में अभी तक स्पष्ट रूप से नहीं पड़ा है तो आप हमारा संधि वाला आर्टिकल भी पढ़ सकते हैं।

क्या आपको पता है शब्दों का निर्माण चार प्रकार से किया जाता है।
1. संधि के द्वारा
2.समास के द्वारा
3.उपसर्गों के द्वारा
4.प्रत्ययो के द्वारा

समास की परिभाषा

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samas ki paribhasha

samas ki paribhasha

समास शब्द सम् + आस से मिलकर बना है जिसका अर्थ होता है बराबर अर्थात पास में बैठाना। समास को हम दूसरे शब्दों में परिभाषित करें तो हम कहेंगे कि किसी भी बात को कम से कम शब्द में कहने तथा लिखने के लिए समास का प्रयोग किया जाता है।

समास के नियमों से बंधा हुआ पद समस्त पद या सामासिक पद कहलाता है, सामासिक पद 2 पदों से मिलकर बना होता है, जिसमें प्रथम पद को पूर्व पद तथा दूसरे पद को उत्तर पद कहा जाता है। इस पद को पुनः उसी स्थिति में लाना समास विग्रह कहलाता है।

समास का शाब्दिक अर्थ ‘संक्षेप’ होता है।

समास के प्रकार या समास के कितने भेद हैं

समास के 6 प्रकार या भेद होते है।   होते हैं, लेकिन पद की प्रधानता के आधार पर समास के चार भेद बताए गए हैं।
1. अव्ययीभाव समास
2. तत्पुरुष समास
3. कर्मधारय समास
4. द्विगु समास
5. द्वंद समास
6. बहुव्रीहि समास

Note –
अव्ययीभाव समास मैं (पूर्व पद प्रधान) होता है।
तत्पुरुष समास, कर्मधारय समास, द्विगु समास, मैं (उत्तर पद प्रधान) होता है।
द्वंद समास में (दोनों पद प्रधान) होते हैं।
बहुव्रीहि समास में दोनों पद अप्रधान होते हैं।

A. अव्ययीभाव समास

जिस समास का पहला पद अव्यय हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं, इसके सामासिक पदों का प्रयोग क्रिया विशेषण के रूप में किया जाता है।

अव्ययीभाव समास को पहचानने का तरीका – आ, प्रति, प्र, पर, उप, अनु, स, यथा, भर जिस शब्द में भी यह उपसर्ग आएं वहां अव्ययीभाव समास होगा।

यदि शब्दों की पुनरावृति हो तो वहां भी अव्ययीभाव समास होगा।

अव्ययीभाव समास के उदहारण 

प्रत्येक = हर एक
आजीवन = जीवन से लेकर
यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
भरपेट = पेट भर कर
प्रत्यक्ष = दूसरे के सामने
परोपकार = दूसरों पर उपकार
दिनानुदिन = दिन के बाद दिन

B. तत्पुरुष समास

तत्पुरुष समास में विभक्ति चिन्ह का लोप हो जाता है, कारक विभक्ति के आधार पर समास के 6 भेद होते हैं जिसमें कर्ता कारक तथा संबोधन कारक को छोड़ दिया जाता है।

      कारक     विभक्ति चिन्ह
      कर्ता         ने
      कर्म        को
      करण        से , के द्वारा (जोड़ना )
     संप्रदान        के लिए
     अपादान        से (अलग होना)
     संबंध       का, की, के
    अधिकरण       मैं,  पर
    संबोधन      ओ, जी, ए, जी

 

1. कर्म तत्पुरुष – इसके सामासिक पदों में कर्म कारक की विभक्ति ‘को’ का लोप हो जाता है। इसे हम द्वितीय तत्पुरुष भी कहते है।

कर्म तत्पुरुष के उदाहरण 

रथ चालक = रथ को चलाने वाला
गगनचुंबी = गगन को चूमने वाला
चिड़ीमार = चिड़ियो को मारने वाला
जेबकतरा = जेब को काटने वाला

2. करण तत्पुरुष – इसके सामासिक पदों में करण कारक की विभक्ति ‘से’ , ‘के द्वारा’ का लोप होता है। इसे हम तृतीय तत्पुरुष भी कहते हैं।

करण तत्पुरुष के उदाहरण 

करुणा पूर्ण = करुणा से पूर्ण
भयाकुल = भय से आकुल
रेखाकित = रेखा से अंकित
शोकग्रस्त = शौक से ग्रस्त
मनचाहा = मन से चाहा
सुररचित = सूरत द्वारा रचित
चरित्रवान = चरित्र से वान
भयाकुल = भय से आकुल

3. संप्रदान तत्पुरुष – इसके सामासिक पदों में संप्रदान कारक की विभक्ति ‘के लिए’ का लोप हो जाता है, इसे हम चतुर्थी तत्पुरुष भी कहते हैं।

संप्रदान तत्पुरुष के उदाहरण 

प्रयोगशाला = प्रयोग के लिए साला
स्नानघर = स्नान के लिए घर
गौशाला = गो के लिए शाला
देश भक्ति = देश के लिए भक्ति
परीक्षा भवन = परीक्षा के लिए भवन
रसोईघर = रसोई के लिए घर
हथकड़ी = हाथों के लिए कड़ी

4. अपादान तत्पुरुष – इसके सामासिक पदों में अपादान कारक की विभक्ति ‘से’ का लोप हो जाता है। यहां ‘से’ का अर्थ अलग होने से है।

अपादान तत्पुरुष के उदाहरण 

धनहीन = धन से हीन
गुणहीन = गुण से हीन
पाप मुक्त = पाप से मुक्त
जल हीन = जल से हीन
पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
रोग मुक्त = रोग से मुक्त

5. संबंध तत्पुरुष – इसके सामासिक पदों में संबंध कारक की विभक्ति का की के का लोप हो जाता है। इसे हम षष्टि तत्पुरुष भी कहते हैं।

संबंध तत्पुरुष के उदाहरण 

राजपूत्र = राजा का पुत्र
पराधीन = पर के अधीन
विद्यासागर = विद्या का सागर
शिवालय = शिव का आलय
देशरक्षा = देश की रक्षा
पराधीन = पर के अधीन

6. अधिकरण तत्पुरुष – इसके सामासिक पदों मैं अधिकरण कारक की विभक्ति ‘मे’ ‘पर’ का लोप हो जाता है। इसे हम सप्तमी तत्पुरुष भी कहते हैं।

अधिकरण तत्पुरुष के उदाहरण 

शोक मग्न °= शोक में मग्न
पुरुषोत्तम = पुरुषों में उत्तम
गृह प्रवेश = गृह में प्रवेश
लोकप्रिय = लोक में प्रिय
धर्मवीर = धर्म में वीर
कलाश्रेष्ठ = कला में श्रेष्ठ

C. कर्मधारय समास –

कर्मधारय समास में 2 नियम होते हैं। पहला होता है। विशेषण यह ‘विशेष्य’ से संबंधित होता है। और दूसरा होता है उपमेय यह उपमान से संबंधित होता है।

1. विशेषण – विशेष्य संबंध जब किसी संज्ञा की कोई विशेषता बताई जाती है, तो उसे विशेषण कहते हैं और जिसकी बताई जाती है उसे विशेष्य कहते हैं।

Ex –
लाल गाय = लाल है जो गाय
नीलकंठ = नीला है जो कन्ठ
स्वागत = अच्छा है जो आगमन
लालमणि = लाल है जो मणि
पीतांबर = पीला है जो अंबर
सुग्रीव = सुंदर है जो ग्रीवा
महादेव = महान है जो देवता
पीतांबर = पीला है जो अंबर

2. उपमेय उपमान संबंध – जब किसी संज्ञा की तुलना उसके गुणों के आधार पर अन्य वस्तु से की जाए तो उसे उपमेय उपमान संबंध कहते हैं। जिसकी तुलना की जाती है उसे उपमेय और जिस से की जाए उसे उपमान कहते हैं।

Ex –
मृगनयन = मर्ग के समान नयन
चंद्रगुप्त = चंद्र के समान मुख
कनकलता = कनक के समान लता
चरणकमल = कमल के समान चरण
सूर्य प्रताप = सूर्य के समान प्रताप
सिंह पुरुष = सिंह के समान पुरुष

4. द्विगु समास –

जिस समस्त पद का पूर्व पद संख्या वाचक हो वह द्विगु समास कहलाता है। इस समास का पहला पद संख्यावाची होता है।

द्विगु समास के उदहारण 

दोपहर = दो पहरो का समय
चौराहा = चार राहों का समूह
त्रिभुज = तीन भुजाओं का समूह
त्रिफला = तीन फलों का समाहार
पंचवटी = पाँच वटों का समूह
त्रिशूल = तीन शूलों का समूह

5. द्वंद समास –

ऐसे पद जिसमें दोनों पद आवश्यक हो या एक दूसरे के विपरीत हो वे द्वंद समास के अंतर्गत आते हैं उनका विग्रह करते समय दोनों पदों के बीच ‘मैं’ , ‘और’ एवं ‘तथा: का प्रयोग किया जाता है।

द्वंद समास के उदाहरण 

नदी-नाले = नदी और नाले
पाप-पुण्य = पाप और पुण्य
देश-विदेश = देश और विदेश
ऊंच-नीच = उच और नीच
आगे-पीछे = आगे और पीछे
राजा-प्रजा = राजा और प्रजा
नर-नारी = नर और नारी
60 एवं 10 = 70

6. बहुव्रीहि समास

बहुव्रीहि समास में ऐसे शब्द आते हैं जो किसी दूसरे व्यक्ति की ओर संकेत करते हैं बे बहुव्रीहि समास कहलाते हैं बहुव्रीहि समास में दोनों पद अप्रधान होते हैं और कोई तीसरा पद प्रधान होता है।

बहुव्रीहि समास के उदाहरण 

लंबोदर = लंबा है उदर जिसका गणेश जी
नीलकंठ = नीला है कंठ जिनका शिव जी
महादेव = महान है जो देव शिव जी
महावीर = महान है जो वीर हनुमान जी
सुग्रीव = सुंदर है जिसकी ग्रीवा मोर
पंचानन = पांच है आनन जिसके हनुमान जी
शारदा = शार को देने वाली सरस्वती जी
चतुर्भुज = चार है भुजा जिनकी विष्णु जी
धर्मराज = धर्म के

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